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मौत - देश रत्न (Desh Ratna)

बीती रात कोई मर गया शायद, उजाला बस्ती में कफ़न का कार गया शायद . मौत उसके पीछे ना पड़ी थी, बेचारा ज़िन्दगी से डर गया शायद. नुमाइश को यूँ तो एक जिस्म रक्खा था, सुबह त़क वो भी सड़ गया शायाद. थककर ज़िन्दगी के रेलम-पेले से, सफ़ेद काप्दों में वो संवर गया शायद.. year - 2003 Malviya Nagar delhi सारे शेर मेरी तरह आवारा हैं....कद्रदानों से मुआफी की तलब है..

एक और गुस्ताख़ी - देश रत्न (Desh Ratna)

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जब तुने बनाया हुस्न तो ये दिल बनाया क्यूँ? मेरे रोशन किये चरागा ने मेरा घर जलाया क्यूँ? रौशनी के जशन में उजालों का सबब उम्दा, रौशनी की बारात में तीरगी को बुलाया क्यूँ? अन्धेरें में सक्सियत गुमनाम ही सही, सूरज ने फिर उगने का वादा निभाया क्यूँ? उसे नागुज़र थी हमारी सोहरत शायद, सेहरा की भीगी रेत से हवा ने मेरा नाम मिटाया क्यूँ?

हूंकार - देश रत्न (Desh Ratna

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__हूंकार पुनः यज्ञ का आह्वान करो, समव्येत स्वरों में गान करो, रौद्र रूप का ध्यान करो, जौहर करती माताओं के जलते बदन का मान करो, पाञ्चजन्य का हुंकार करो, तुणीर का झंकार करो, माता की कोख पे प्रश्न चिन्ह उठा है वीर पुत्रों बलिदान करो! पुरुषार्थ बांशुरी में छीण हो गया वज्र उर्वशी में लीन हो गया मधुघट के ऐ मधुमारों देखो राष्ट्र ध्वज है हीन हुआ अरे छोड़ों बापू की बात पुरानी याद करो भगत जवानी वो शिवाजी अमर बलिदानी सुभाष आज़ाद की अमर कहानी माता की छाती से लगकर तुमने बचपन खेला है बहुत ज्यादा ख़ुशी हाँ कुछ ग़म भी तुमने झेला है अरे सिंहों अपना तेवर बदलो तेवर बदलो जेवर बदलो बदल डालो सब हाहाकारों से रणचंडी के धुआंधारों से तनमन अपना दान करो प्रलय का ऐसा घमासान करो दनुज दैत्य चीत्कार उठें राष्ट्र संख फिर हुँकार उठे पाषाणों में छिपी है आग स्वप्नों से तो अब तू जाग सिसक-सिसक कर रोती माता छेड़ कोई हाहाकारी राग. तेरे निंद्रा से मान घटा है माता का स्वाभिमान घटा है, कबसे कंचनी-कुमुदनी में खोया आज माता का वस्त्रमान हटा है. मुकुट शीश से उठा ले गए दनुज देखता रह गया तू नपुंशक मनुज थू-थू करता हूँ तुझपे थू-थू अब त...

Desh Ratna with Miss Universe Stefania @ her initiation with Vihangam Yoga

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‎' भारत विश्व गुरु की भूमिका में अनादी काल से सत्य की तलाश में पथीकों को मार्ग प्रशस्त करता आ रहा है.. इसी कड़ी में नया अध्याय जोड़ते हुए वर्तमान विश्व सुंदरी (THE CURRENT MISS UNIVERSE STEFANIA FERNANDEZ) को ८ जुलाई २०१० को विहंगम योग के ज्ञान से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.. दीक्षा लेने के उपरान्त उनके शब्द थे - "ये वो उपहार लेकर जा रही हूँ जो मुझसे कोई नहीं ले सकता" जय सदगुरुदेव !.

ढोंगी बने रहने से बेहतर है पूर्णः नास्तिक बन जाना.

अगर कोई इश्वर है ? अगर कोई सत्य है ? तो उसे साक्छात्कार करने का सहस करो ... ढोंगी बने रहने से बेहतर है पूर्णः नास्तिक बन जाना.